May 8, 2021

(पूरी हकीकत)

सचमुच बहुत याद आओगे केसी यादव साहब, आप तो जबरदस्त फाइटर थे काश आप कोरोना को भी जीत पाते!!

“लखनऊ से काठमांडू तक की साइकिल यात्रा, विश्व शांति के लिए की थी इस आईएफएस ने”

जड़ी बूटियों तथा पर्यावरण के संबंध में चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया थे केसी यादव साहब

राजाराम त्रिपाठी@रायपुर :- मौत की खबर और मौत के डर से मैं अमूमन विचलित नहीं होता हूं। इस खबर ने सच में मुझे कुछ समय के लिए स्तब्ध कर दिया। टीवी पर खबर चल रही थी 1984 बैच के आईएफएस अफसर ‘केसी यादव’ की “कोरोना” से हुई मौत। समाचार जगत के लिए शायद आपका यही परिचय महत्वपूर्ण है, आईएफएस – 84 बैच, बस एक उच्चाधिकारी, और देश के लिए, यह हैं कोरोना से मरने वालों के आंकड़ों में एक अदद मात्र की वद्धि। छत्तीसगढ़ कई मायनों में सौभाग्यशाली प्रदेश रहा है । कोरोना के कहर से भी यह प्रदेश अब तक कदरन बचा हुआ था। पर कोरोना से हुई इस मौत ने पूरे प्रदेश को मानो स्तब्ध कर दिया है, इस बात ने पूरे प्रदेश को कोरोना के भयावह रूप की झलक एक बार फिर से दिखाई है।
अभी इसी इतवार तक तो यादव जी खुद अपनी कार चलाते हम लोगों को दिखे थे, और मुस्कराते हुए हाथ उठाकर विश भी किया था।
शारीरिक रूप से बेहद सक्रिय तथा हमेशा फिट रहने वाले कृष्ण चंद्र यादव जी को कोरोना मानो एक झपट्टे में ले गई, लेकिन अपने परिजनों,मित्रों, साथियों, जानने-चाहने वालों, व सहकर्मियों के दिलों में आप सदैव एक अनूठे, जिंदादिल व्यक्तित्व के रूप में जिंदा रहेंगे।
आज से लगभग 20 साल पहले आप से पहला परिचय हुआ था उन दिनों आप नए नवेले बने छत्तीसगढ़ प्रदेश के औषधीय पादप बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने थे। यह मलाईदार महकमा वन विभाग का की यह अनाकर्षक लूपलाइन पोस्टिंग थी। नया नया विभाग खुला खुला था ,पैसों की कोई व्यवस्था नहीं थी। मुझे तब औषधीय खेती खेती करते तकरीबन 7 साल हो चुके थे, हमारी हर्बल खेती की संघर्ष कथा भारत सरकार के विज्ञान तथा तकनीकी मंत्रालय से प्रकाशित होने वाली पत्रिका साइंस टेक इंटरप्रेटर के कवर पर प्रकाशित हो चुकी थी, तत्कालीन मुख्यमंत्री सर जी अजीत जोगी जी छत्तीसगढ़ के तत्कालीन गवर्नर दिनेश नंदन सहाय जी आदि कई मंत्री अधिकारी हमारे हर्बल क्षेत्रों का भ्रमण कर चुके थे। अब क्योंकि यादव जी हिंदी नव औषधीय बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे सो उनका भी हमारे खेतों पर पधारना होना ही था, सो हुआ। यादव‌ जी ने हमारी हर्बल की खेती को खेतों पर जाकर देखने समझने में गहरी रुचि दर्शाई। जल्द ही हमारी मुलाकात, दोस्ती में बदल गई दोस्ती भी ऐसी, कि जिसका कोई व्यवसायिक आधार ना था। वनवासी आदिवासियों की जीवन पद्धति तथा दिनोंदिन विनष्ट होते जा रहे पर्यावरण के मुद्दों पर हम घंटों बात करते, कई बार कई मुद्दों पर हम एकमत नहीं होते थे ,और घंटों बहस चलती थी, पर हर बहस का अंत हर्बल चाय की प्याली व मुस्कुराहट के साथ दोबारा फिर जल्दी मिलने के वादे के साथ होता था। उनके जीवन के कई उजले पहलुओं के बारे में शायद प्रदेश के लोगों को तथा उनके साथियों को पता नहीं होगा। यादव जी अपने स्कूल तथा कॉलेज के के दिनों के संघर्ष के बारे में प्रायः बताते थे। यादव जी उत्तर प्रदेश के एक साधारण परिवार में पैदा हुए थे, बचपन से ही बहुत ही मेधावी छात्र थे, अपने लिए लक्ष्य सदैव ऊंचा रखते थे ।
सिविल सर्विस की तैयारी के लिए इलाहाबाद में उन दिनों के नामचीन कोचिंग सेंटर में किसी तरह से फीस की पहली किस्त की व्यवस्था करके एडमिशन लिया। आगे की फीस की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी, तभी किसी सीनियर सहपाठी ने बताया कि यह कोचिंग संस्थान मेधावी छात्रों को मुफ्त में भी कोचिंग देता है, और उसमें कोचिंग संस्थान की निदेशक से मिलने का सुझाव दिया। यादव जी हिम्मत करके अपनी फीस माफ करवाने के लिए कोचिंग संस्थान के प्रमुख के दफ्तर पहुंच गए। अनुभवी शिक्षक ने कुशल जौहरी की भांति हीरे की योग्यता व प्रतिभा को पहचान लिया, फीस तो माफ हुई ही, इतना ही नहीं उनके व्यवहार तथा गुणों पर मुग्ध होकर , कालांतर में उन्होंने अपनी लाडली कन्या का विवाह भी इन्ही के साथ सुनिश्चित कर दिया। बहुत कम लोगों को पता होगा कि, यही यादव जी ने अपने शिक्षा प्राप्ति के दिनों में अपने सहपाठी के साथ साइकिल से विश्व शांति तथा वसुधैव कुटुंबकम के प्रचार प्रसार का लक्ष्य लेकर उत्तर प्रदेश लखनऊ से नेपाल के काठमांडू तक की साइकिल यात्रा की थी, जो उन दिनों देश भर के अखबारों की सुर्खियां भी बनी थी। अपने महकमे में व्याप्त शिष्टाचार- भ्रष्टाचार को लेकर भी यादव जी दुस्साहसी साबित नहीं हुए, इसीलिए उनकी ज्यादातर पोस्टिंग लूप लाइन में ही रही। खाना की अपने विभाग मां के कानून तथा उससे संबंधित जानकारियों के वह चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया थे। उनकी व्यावहारिक सूझ बूझ अनूठी थी। मामला कितना भी जटिल से जटिल क्यों न हो, उसका सरल सहज उपाय चुटकियों में सुझाने में उन्हें महारत हासिल थी। मुलाकातों के दौरान हमेशा‌ आंखों में शरारती चमक के साथ मंद मंद मुस्कुराते हुए ऐसा वातावरण बना देते थे, जानो मानो कोई बड़े रहस्य की बात बताने वाले हों, पर बातें बेहद सरल और सहज होती थी। आज याद आता है कि,कितनी सारी भविष्य की योजनाएं बना रखी थी उन्होंने। रिटायरमेंट के पूर्व एक बार मैंने उनसे पूछा था कि, ज्यादातर उच्चाधिकारी रिटायरमेंट के पहले ही अपने पुनर्वास की व्यवस्था कर लेते हैं, तो भाई साहब रिटायरमेंट के बाद की क्या योजना बना रखी है? आपने क्या सरकार अपने ‌ किसी संस्थान में आगे आपके अनुभव का फायदा सरकार लेगी? उन्हें अपने अनुभव तथा ज्ञान पर बड़ा भरोसा था, उन्होंने कहा कि मुझे पूरा यकीन है कि सरकार या तो मेरा कार्यकाल आगे बढ़ाएगी अथवा संविदा पर ले लेगी। बहरहाल रिटायरमेंट के कुछ दिनों बाद जब मुलाकात हुई , तो मैंनेने पूछा क्यों भाई आपके पुनर्वास की क्या व्यवस्था हुई? तो उन्होंने कहा कि कि रिटायरमेंट के पहले ही आगे की कोई सही व्यवस्था हो जाए इसके लिए बहुत हाथ पैर मारा पर नतीजा सिफर ही रहा। देखते-देखते रिटायरमेंट की तारीख आ गई हम लोगों ने गुलदस्ता देकर विदा कर दिया। इस पर मैं ने उन्हें कहा कि भाई साहब आप तो समय लेकर सीधे सीएम साहब के पास जाकर गुहार लगाओ, आप इतने अनुभवी तथा विशेषज्ञ अधिकारी हैं , आप जैसे अधिकारी की तो प्रदेश को जरूरत होती ही है। मुझे आशा है कि वे आपकी सेवाओं के लिए कहीं ना कहीं उपयोगी व्यवस्था अवश्य हो जावेगी। खैर बात आई गई हो गई क्योंकि वह ज्यादातर बस्तर कोटा गांव में ही रहता हूं रायपुर आना जाना लगभग नहीं के बराबर होता है इसलिए कुछ महीने बाद जब फिर उनसे मुलाकात हुई तो मैंने उनसे बताओ तथा दूसरी पारी के बारे में फिर से पूछा फिर पूछा , हो जा भी पूछ लिया कि मुख्यमंत्री जी के पास गए थे अथवा नहीं। वो अपनी उसी राजदाराना मुस्कुराहट के साथ कुछ देर तक तो मुझे एकटक देखते रहे ,फिर बड़े धीरे शब्दों में लगभग फुसफुसाते हुए बोले, गुरु डॉ साहब यह तो गजब किस्सा है ,चलो चाय हर्बल चाय बनवाओ, फिर बताता हूं। फिर उन्होंने बताया कि आपकी तथा अन्य शुभचिंतकों के राय से मैंने मुख्यमंत्री जी से मिलकर इस पर चर्चा करने के लिए चर्चा करना तय किया और साथ में अपने एक अन्य मित्र उच्चाधिकारी जो कि अपने सेवाकाल में बड़े तेजतर्रार अधिकारी माने जाते थे, ्और कुछ समय पहले ही रिटायर हुए थे तथा वह भी आगे राज्य सेवा को राज्य शासन को सेवा देने को इच्छुक थे उन्हें भी साथ में ले लिया। सीएम के दरबार में पहुंचे जब मिलने की बारी आई यादव साहब ने अपने साथी अधिकारी को आगे कर दिया कहा गुरु आप पहले मिल लो, अधिकारी ने अपना सेवाकाल बरखा दें अथवा संविदा नियुक्ति आदि का निवेदन मे प्रस्तुत किया मुख्यमंत्री ने एक बार उन्हें नीचे से ऊपर तक देखा और कहा,, जनता को और कितना लूटोगे भाई !! बेचारे अधिकारी की जुबान को मानो ताला लग गया। फिर मुख्यमंत्री जी यादव साहब की ओर मुखातिब हुए पूछा जी आप सुनाएं ? यादव साहब ने कहा , कुछ नहीं श्रीमान सब सकुशल है, बस आपको बधाई देने आया था, बाकी सब खैरियत है ,आपकी कृपा से ,और हाथ जोड़े और चले आए। ऐसे कितने ही वाकये और किस्से यादव जी ने साझा किए हैं ,कि अगर लिखने बैठे तो उस पर एक बेहतरीन पुस्तक बन सकती है, जिसमें अंग्रेजों द्वारा स्थापित इस विभाग में आज की अधिकारियों की आपसी खींचतान, मलाईदार पोस्टिंग, स्थानांतरण व पदोन्नति जी चूहा दौड़, मानवता तथा मानवीय रिश्तों के बखिया उधेड़ती ब्यूरोक्रेसी और राजनीति की जुगलबंदी और नीचे से ऊपर तक सर्वव्यापी भ्रष्टाचार की असली हकीकत से रूबरू हुआ जा सकता है। मेरा मानना था कि, यादव साहब इस विभाग के लिए कतई फिट व्यक्ति नहीं थे। उनकी नैतिकता मरी नहीं थी। यद्यपि उन्होंने अपना सेवा कार्य ठीक-ठाक तरीके पूरा कर ही लिया, और मेरी जानकारी के अनुसार भैया कह सकता हूं, कि, काजल की कोठरी से भी वे लगभग बेदाग ही निकल आए।
बेहद ही सरल सहज तथा जीवंतता तथा मानवीय गुणों से भरपूर बिंदास इंसान थे यादव जी। अधिकारियों का फूंफां वाला मिजाज तथा अंदाज तो उन्हें छू भी नहीं गया था।
पदोन्नति के मामले में भी वह कई बार बताते थे ,कि कैसे उनके साथ अन्याय होता था, और वह कुछ प्रतिकार भी नहीं कर पाते थे। दरअसल वह जन्मजात शिक्षक थे। प्रकृति तथा पर्यावरण के प्रति लगाव और प्रेम के अलावा भी हम दोनों में की कई रुचियां मिलती थी। मैं भी एपीजे अब्दुल कलाम से बहुत प्रभावित रहा हूं यादव साहब उनसे बहुत प्रभावित थे यहां तक कि उन्होंने बड़े-बड़े शब्दों में एक बड़ा पोस्टर बनवा रखा था जो उनके खुशी के ठीक पीछे लगा रहता था जिस पर आपका ध्येय वाक्य लिखा हुआ था ,
“छोटा सपना देखना अपराध है”
“एपीजे अब्दुल कलाम”
यादव जी,आपने भी हमेशा बड़े सपने देखे, और मुझे यह भी पता है कि आप के कई सपने अनगढ़-अधूरे रह गए हैं,जरा यह भी तो सोचिए, सारे सपने किसके साकार हुए हैं भला ??
मुझे तो अभी भी यकीन नहीं होता, ऐसा लगता है कि आप डॉक्टर साहब हैं क्या , कहते हुए सदा की तरह दरवाजा खोल के सीधे कमरे में घुस आएंगे, और उसी तरह से ठहाका लगाते हुए कहेंगे गुरु डॉ साहब हर्बल चाय हो जाए???
हम मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के सभी सदस्य तथा प्रदेश के सभी लोग जो आपको जानते पहचानते हैं की ओर से, हम सब इस सृष्टि की निर्माता परम सत्ता, भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि यादव जी,आप जहां भी हों, आपकी आत्मा को परम शांति प्राप्त हो।

डॉ राजाराम त्रिपाठी
राष्ट्रीय समन्वयक
अखिल भारतीय किसान महासंघ ( आईफा )
www.farmersfederation.com
wwwDrRajaramTripathi.com

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